Monday, May 22, 2006

मुहाफ़िज़ हूं मैं अपनी सरहदों का

मुहाफ़िज़ हूं मैं अपनी सरहदों का
कोई मेरी ज़मीं पर पांव रक्खे तो, उसको भून देता हूं
मैं अपनी सरज़मीं का पासबां हूं

अगर दुश्मन कोई गोली चलाए तो
मेरे सीने से गुज़रेगी तो पार होगी वो सरहद से
मैं उस गोली को अपने देश की मिट्टी पे गिरने नहीं दूंगा।

मेरी सरकार मुझको... इसलिए...
टैक्स सारे कट कटाके
दो हज़ार और तीन सौ पैंतीस रुपए हर माह देती है

मेरी अपनी ज़मीं भी है-
जो साहुकार के हां गिरवी रक्खी है
मुझे जाकर अभी वो भी छुड़ानी है॥
- गुलज़ार

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