Tuesday, June 19, 2007

क्या फिर

कभी आवारा सी भटकती
कभी मेघों सी उमड जाती
बारिश की पत्तियों सी टपकती
कभी यूं ही बरबस बरस जाती
ये आंखें आज फिर भर आयी हैं
क्या फिर मेरी याद आयी है.

Friday, June 15, 2007

तुम

मैं रहा जितना भी दूर तुमसे.
तुम हरदम मेरे पास थी.
खुशियों में हंसी थी खुलकर.
कभी मेरे संग उदास थी.
अंधेरे में किरण रोशनी की.
नम आंखों की बरसात थी.
परेशानियों में कांधा थी मेरा.
मेरी गर्दिशों में उपवास थी.
मेरे डगमगाते आत्म-विश्वास को
थामता एक विश्वास थी.

दर्श

रात की भीगी ओस से जो स्पन्द मिला,
भोर उपवन में एक पुष्प खिला,
नर्म पंखुडियां छूकर जो हर्ष मिला,
उसी संवेदन सा तेरा स्पर्श मिला,
आज उडती हवाओं में जब हर्ष खिला,
मन के सूने कोने को एक फ़र्श मिला,
तुम्हारी ना से हां का लंबा वर्ष मिला,
सांस आयी जब तुम्हारा दर्श मिला ।

Thursday, June 14, 2007

आंखें


शान्त दरिया के सीने पर तैरते,
विशाल कमल पात पर थमी थमी,
एक बून्द पानी की मासूम सी,
कभी चौन्धियाती, सूरज को मुंह चिढाती,
तपन तेज हो तो बौखलाती.

जब वक्त का दरिया चढेगा,
और पानी लहरों में उछलेगा,
ये बून्द ढलकर दरिया के सीने में छुप जायेगी.

एक दायरा है वक्त का, एक दायरे में वक्त है,
कुछ देर सांस लेती बून्दे, इस दायरे में खो जायेंगी.

तुम्हारी आन्खो में रखी है एक बून्द पानी की,
थाम सको तो थाम लो इन्हे आखों में,
इन आखों कि ज़िन्दगी है, ओज है ये बून्द,
इन ज़िन्दा आखों की ज़िन्दगी सम्हाल रखो तुम.

रिश्तों के पतझड इन आखों से भी गुजरेंगे,
मासूमियत की नमी भी रौन्देंगे,
अच्छा हो दोनों हथेली से ढांप लो, वक्त से छिपा लो.

मन में सच को यूं ही सुलगने दो,
और रिश्तों से सींच रखो,
पतझड की तपन भी नम होकर गुजरेगी इन आंखो से
इन ज़िन्दा आखों की ज़िन्दगी सम्हाल रखो तुम.

सागर


बारिश की छोटी छोटी बूंदें
आ कर सागर के सीने को छूती हैं
सागर भी एक अहसास के साथ
समेट लेता है उन्हें अपने सीने में
और बहुत कुछ समेटे है,
एक ब्रम्हान्ड जीवों का
न जाने कितने जीवन, कितनी सांसें
शेष बचे अवशेष जीवन के भी.
बडे एहतियात के साथ
धरती के शरणार्थी दरियाओं को
सहेज कर अपने रंग में रंग लेता है

बरसाती नालों और नदियों के विपरीत
मेघों का नीर भी शान्त होकर सहेजता.
कहीं दूर किनारों पर खेलता है,
बालू के छोटे छोटे कणों से
कुछ अपने साथ चुरा कर ले आता
कुछ भेंट भी कर आता है

इस चेहरे पर थमा शान्त सागर
सराबोर है अनगिनत ज्वार भाटों से
एक इजाज़त तो झांक लूं इन आंखों में
इस में जी लेना भी शायद
एक सिरा थमा दे जीवन का

दो ज़िन्दगी


एक फ़ेन्सिंग के आर पार हम दोनों
पडोसी हैं एक दूसरे के

एक ज़िन्दगी है जो तुम जी रही हो
एक ज़िन्दगी जो मैं भोग रहा हूं

कभी रसोई से तरकारी भेजता
और उसी कटोरे में ले आता था
कुछ स्वाद तुम्हारी ज़िन्दगी का

सोचता हूं कि कभी दरवाज़ा खोल
दावत दूं तुम्हें अपनी विचारों में
बदले में तुम भी तो बुलाओगे कम से कम एक बार
कुछ पल जी लूंगा तुम्हारी ज़िन्दगी के

पर सोच के डरता हूं
मेरी ज़िन्दगी के बोझ तले तुम दब जाओगी या फ़िर
तुम्हारे खुले आकाश में मैं उड नहीं पाऊंगा

अच्छा हो अपनी अपनी खिडकियां खोल दें
हवा ही आती जाती रहे,
कुछ देर सांस तो ले ले हम दोनों

Monday, May 22, 2006

मैं और मेरा जीवन


मैं भंवरे की गुंजन में जीता हूं ,
भोर पत्तियों की ओस पीता हूं,
मेघ से गिरता रहा हूं बूंदों में,
भावों सा उमड जाता क्षणों में,
बिखर मुस्कान पर बसता हूं,
खिलते फूलों सा हंसता हूं,
पीडा से सिसक रोता हूं
नयनों के ढले अश्रु पीता हूं

नवजात मातृत्व का वात्सल्यित हर्ष
प्रथम संतति का प्रथम दर्श
पति के नयनों में पत्नि ॠण
एक और बंधन से दाम्पत्य दृण
जीवन के इस क्षण में जीता हूं

मैं हूं सुर शिशु के प्रथम कृन्दन का, आवेग जीव में सन्चरित हृद्स्पन्दन का ।
चिपते प्रेमियों की दबी चोर पद्चाप, कांपते होठों की सिहरन का आलाप ।
अन्जुलि भरे चेहरे में डूब तलाशती, नयनों की परछाई का विश्वास ।
धडकन ताल की जुगलबंदी में, एक सप्तक सी सुरीली उच्छवास ।
दूर मत ढून्ढो मुझे मैं हूं तुम्हारे पास,
तुम में, तुम्हारे अस्तित्व का आभास ।
राह पे रहते हैं, यादोन पे बस्र कर्ते हैन
खुश रहो अहल-ए-वतन, हम तो सफ़र करते हैं

जल गये जो धूप मे तो, साया हो गये,
आसमां का कोई कोना, ओढा सो गये,
जो गुज़र जाती है बस उस पे गुज़र करते है

उडते पैरों के तले जब बहती है ज़मीं
मुड के हमने कोई मन्ज़िल देखी है नहीं
रात दिन राह पे हम, शाम-ओ-सहर करते हैं

ऐसे उजडे आशियाने तिनके उड गये
बस्तियों तक आते आते रस्ते मुड गये
हम ठहर जायें जहां, उस को शहर कहते हैं

फ़िल्म : नमकीन
गीत : गुलज़ार
संगीत : राहुल देव बर्मन
सीता को देखे सारा गांव, आग पे कैसे धरेगी पांव,
बच जाये तो देवी मां है, जल जाये तो पापन,
जिसका रूप जगत की ठन्डक, अग्नि उसका दर्पण
सब जो चाहें सोचे समझें लेकिन वो भगवान
वो तो खोट कपट के बैरी वो कैसे नादान

अग्नि पार उतर के सीता जीत गयी विश्वास,
देखा दोनों हाथ बढाये राम खडे थे पास
उस दिन से संगत में आया, सचमुच का वनवास.

ज़ेहरा निगाह (पाकिस्तान) द्वारा
(हिन्दी चलचित्र "पिन्जर" में प्रयुक्त रचना. )

मुहाफ़िज़ हूं मैं अपनी सरहदों का

मुहाफ़िज़ हूं मैं अपनी सरहदों का
कोई मेरी ज़मीं पर पांव रक्खे तो, उसको भून देता हूं
मैं अपनी सरज़मीं का पासबां हूं

अगर दुश्मन कोई गोली चलाए तो
मेरे सीने से गुज़रेगी तो पार होगी वो सरहद से
मैं उस गोली को अपने देश की मिट्टी पे गिरने नहीं दूंगा।

मेरी सरकार मुझको... इसलिए...
टैक्स सारे कट कटाके
दो हज़ार और तीन सौ पैंतीस रुपए हर माह देती है

मेरी अपनी ज़मीं भी है-
जो साहुकार के हां गिरवी रक्खी है
मुझे जाकर अभी वो भी छुड़ानी है॥
- गुलज़ार