Monday, May 22, 2006

मैं और मेरा जीवन


मैं भंवरे की गुंजन में जीता हूं ,
भोर पत्तियों की ओस पीता हूं,
मेघ से गिरता रहा हूं बूंदों में,
भावों सा उमड जाता क्षणों में,
बिखर मुस्कान पर बसता हूं,
खिलते फूलों सा हंसता हूं,
पीडा से सिसक रोता हूं
नयनों के ढले अश्रु पीता हूं

नवजात मातृत्व का वात्सल्यित हर्ष
प्रथम संतति का प्रथम दर्श
पति के नयनों में पत्नि ॠण
एक और बंधन से दाम्पत्य दृण
जीवन के इस क्षण में जीता हूं

मैं हूं सुर शिशु के प्रथम कृन्दन का, आवेग जीव में सन्चरित हृद्स्पन्दन का ।
चिपते प्रेमियों की दबी चोर पद्चाप, कांपते होठों की सिहरन का आलाप ।
अन्जुलि भरे चेहरे में डूब तलाशती, नयनों की परछाई का विश्वास ।
धडकन ताल की जुगलबंदी में, एक सप्तक सी सुरीली उच्छवास ।
दूर मत ढून्ढो मुझे मैं हूं तुम्हारे पास,
तुम में, तुम्हारे अस्तित्व का आभास ।
राह पे रहते हैं, यादोन पे बस्र कर्ते हैन
खुश रहो अहल-ए-वतन, हम तो सफ़र करते हैं

जल गये जो धूप मे तो, साया हो गये,
आसमां का कोई कोना, ओढा सो गये,
जो गुज़र जाती है बस उस पे गुज़र करते है

उडते पैरों के तले जब बहती है ज़मीं
मुड के हमने कोई मन्ज़िल देखी है नहीं
रात दिन राह पे हम, शाम-ओ-सहर करते हैं

ऐसे उजडे आशियाने तिनके उड गये
बस्तियों तक आते आते रस्ते मुड गये
हम ठहर जायें जहां, उस को शहर कहते हैं

फ़िल्म : नमकीन
गीत : गुलज़ार
संगीत : राहुल देव बर्मन
सीता को देखे सारा गांव, आग पे कैसे धरेगी पांव,
बच जाये तो देवी मां है, जल जाये तो पापन,
जिसका रूप जगत की ठन्डक, अग्नि उसका दर्पण
सब जो चाहें सोचे समझें लेकिन वो भगवान
वो तो खोट कपट के बैरी वो कैसे नादान

अग्नि पार उतर के सीता जीत गयी विश्वास,
देखा दोनों हाथ बढाये राम खडे थे पास
उस दिन से संगत में आया, सचमुच का वनवास.

ज़ेहरा निगाह (पाकिस्तान) द्वारा
(हिन्दी चलचित्र "पिन्जर" में प्रयुक्त रचना. )

मुहाफ़िज़ हूं मैं अपनी सरहदों का

मुहाफ़िज़ हूं मैं अपनी सरहदों का
कोई मेरी ज़मीं पर पांव रक्खे तो, उसको भून देता हूं
मैं अपनी सरज़मीं का पासबां हूं

अगर दुश्मन कोई गोली चलाए तो
मेरे सीने से गुज़रेगी तो पार होगी वो सरहद से
मैं उस गोली को अपने देश की मिट्टी पे गिरने नहीं दूंगा।

मेरी सरकार मुझको... इसलिए...
टैक्स सारे कट कटाके
दो हज़ार और तीन सौ पैंतीस रुपए हर माह देती है

मेरी अपनी ज़मीं भी है-
जो साहुकार के हां गिरवी रक्खी है
मुझे जाकर अभी वो भी छुड़ानी है॥
- गुलज़ार